"मन का जन्म मनुष्य के जन्म के साथ होता है या उसके भी पहले इतना तो पता नहीं पर आध्यात्मिक दृष्टि से देखो तो गीता में कहा गया है कि मनुष्य अपने मन और पाँचों इंद्रियों के स्वभाव के साथ नए जन्म या नए शरीर में प्रवेश करता है। मन को साधना बड़ा दुष्कर है। और फिर आज के परिवेश में तो कुछ कहना सूर्य को दिया दिखने के समान है ,हम यहाँ फिलॉसफी की या आध्यात्मिकता की बातें नहीं कर रहे है ,वरन आज के समय की ,परिस्थितियों की और मन की समझ की बाते कर रहे है। मन के अपने दायरे है और फिर देश -काल का ,जन्म के समय की परिस्थितियों के साथ ही पारिवारिक माहौल का मन पर जन्म के साथ ही असर होने लगता है। मन की विशेषता है वह अपने को हर स्थिति के अनुरूप ढाल लेता है ,मन या कहे कि जब भी व्यक्ति अपने अवचेतन मन की बातें को अपने जीवन में मिलाने की असफल कोशिश करता है तो वह खुद तो परेशान होता ही है साथ ही अपने सामाजिक और पारिवारिक जीवन में भी परेशानी पैदा कर लेता है। मन के विचारों को रोक नहीं सकता ,जब व्यक्ति दुखी हो या जब वह सुखी हो ये तो उसकी आम जिंदगी की स्थिति है उसी समय उसके अवचेतन मन में कुछ अलग ही विचार उबाल लेते है क्या पता वो भविष्य की किसी योजना में खोया है या अतीत के किसी खुशी के पल में अटका हुआ बैठा हो , मन को वश में करना कोई खेल नहीं लेकिन यदि किसी एक तरीके की बात की जाये तो योग -विज्ञानं से अच्छा कुछ हो नहीं सकता।
"योग के विषय में अभी तक सीमित जानकारी थी तो लगता था ये कैसे इतना प्रभावपूर्ण हो सकता है किसी भी स्थिति में पर जब योग को गहराई से समझा तो पता चला ये समुंद्र है ज्ञान और विज्ञानं की जानकारी का। योग को सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य की लिए ही नहीं वरन मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत महत्व पूर्ण माना गया। आयुर्वेद में भी कहा गया है 75 % बीमारियां पेट की वजह है वही बाकि 25 %बिमारियों की जड़ मस्तिष्क की अवस्था पर निर्भर करती है। योग की जब बात होती है तो लोग या तो अपने अधूरे ज्ञान की वजह से ये नहीं पाते की वास्तव योग जीवन जीने की कला का नाम है आज की बिना नियम की दिनचर्या में तो योग का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है। और हमारा ये दायित्व है की यदि हमें इसका सही प्रकार से कुछ भी ज्ञान है तो उसको अपने साथ ही लोगो के लिए उसका लाभ मिले ऐसा कदम उठाना चाहिए। यदि हिंदी में योग का अर्थ देखा जाये तो वह है "जोड़ना "जोड़ना पर कहा किसे यही समझना योग -विज्ञानं है। जब हम कही भी योग जिसको आजकल की मॉडर्न भाषा में योगा कहने लगे है की बात चलती है तो लोगों को जो पता है वो है योग का एक अंग जिसे आसन कहते है योग की सम्पूर्ण जानकारी के अनुसार योग के आठ अंग है जिनसे योग पूर्ण होता है। परन्तु ऐसा नहीं की जब कोई योग के आठो अंग अपनाये तभी वह सही योग करेगा योग के आठों अंग अपने में पूर्ण है। ये अंग है "यम ,नियम ,आसन ,प्राणायाम ,प्रत्याहार ,ध्यान ,धारणा ,और समाधि। "
जब हम योग को अपनाते है तो सबसे पहले हमारा मन एकाग्र या कहे सकारात्मक होता है ,फिर कुछ समय के अभ्यास के बाद शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है। दिनचर्या में ये फर्क साफ दिखाई देने लगता है ,उसके बाद हमारा अवचेतन मन धीरे -धीरे हमारे वश में होता जब वह हमारे वश हो तो फिर वह जो अनजाने में ही हमें सकारात्मक से दूर करता है उसमे रोक लगती है ,व्यक्ति खुद अपने विचारों का द्रष्टा बन कर उन विचारों को सही मार्ग में ले आने में सक्षम हो जाता है ,योग के लिए सबसे पहले आसन नहीं बताए गए ,पहले नियम और यम बताये गए है। परन्तु यदि पहले आसन करना आसान लग रहा तो कर सकते है। एक समय में योग सन्यसियों या मोक्षमार्ग के साधकों के लिए है ,ऐसी भ्राँति फैला दी गई थी ,योग साधना को दुर्लभ और कठिन मन जाता था, फलस्वरूप ये विद्या लुप्त होती जा रही थी 19 वी सदी के प्रारंभ से अभी तक अनेको संतों और धर्मगुरुओं ने ये जिम्मा उठा कर योग को जन जन के लिए सुलभ और लाभदायक है ये प्रचारित करने के साथ साधारण गृहस्थ को शिक्षित भी किया। योग से मानसिक बीमारियां जड़ से दूर हो जाती है बशर्ते रोगी कुछ नियमो का पालन करने के साथ ही सही खानपान और कुछ विशेष आसन समय पर करे। योग करने के साथ _साथ अपने मन में यह बात
