गुरुवार, 11 मई 2017

BHAVNAO SE BHAGYA BADAL JATE HAi

"भावनाओं से भाग्य बदल जाते है ,ये वाक्य बहुत जगह पढ़ा पर जब खुद आजमाया तब ऐसा लगा कि सचमुच ये  बात जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है  जब   जीवन में   अप्रिय    नकारात्मक घटना घट जाती है तो हमारा     जीवन निराशा से भर उठता है हम दुःख की भावना को स्थाई जगह  अपने जीवन में दे देते है ,और हर परिस्थिति एवम घटना को उसी से जोड़ कर नकारात्मक विचारो और भावनाओं को ही   सच  मन  लेते है पर  जब कुछ अच्छा भी होता है तो उसको थोड़ी  देर की  ख़ुशी   मान कर फिर निराशा की चादर ओढ़ लेते है। '
                 जीवन में जो होता है वह भले ही पहले से निश्चित हो अच्छा या बुरा पर मयने तो इस बात के है कि   आप उस पर प्रतिक्रिया कैसी  है " आज जीवन में सबसे ज्यादा इसी बात की  जरुरत है कि  हम अपनी भावनाओं को समझे और जीवन में  सही तरीके से उनका उपयोग करे तो बहुत सी समस्याएं तो यु ही सुलझ जाएँगी जैसे कि कभी आप सुबह लेट उठे और फिर आपके मन में विचार आया कि अरे अब सब गड़बड़ होगी और एक के बाद एक गड़बड़ होती जाती है और आप सोचते हो मैंने तो कहा   था कि ऐसा ही होगा। सच में आप
 सही है आप जो कहते है वही होता है आपकी भावना बहुत प्रबल होती है उसको आप को नियंत्रित करना होगा। आप के साथ रोज़ के जीवन में ही धीरे धीरे आप को अपनी भावना पर काबू पाना होगा एक बार जब आप अपनीभावना को समझ ने लगेंगे तो आप अहसास  की  भावनाओ के बदलने   से  बहुत सी परेशानिया तो जीवन में है ही नहीं  उनको हमने खुद ही नकारात्मकता की वजह से अपने जीवन में स्थान दे दिया है. जैसे कोई अगर हमसे या हमारी अच्छी बात करता है तो वो हम दो-चार दिनों में भूल जाते है लेकिन यदि कोई हमसे कड़वा बोलता है या कोई हमारी बुराई बताता है तो हम उसे दो-चार साल तक या जब तक पलट कर जबाब न देदे तब याद रखते है यही गलत है क्योकि इस वजह से हम अपने जीवन के अनमोल पलों को यु ही जाया कर देते है ये सोचने में कि उसने मेरे बारे में ये क्यों कहा और भी कई बाही तों पर उस बात का नकारात्मक असर होता है। इसलिए हमे अपनी भावनाओँ को सकारात्मकता की दिशा में मोड़ कर जीवन को आसान बनब चाहिए। 
         "जीवन बहुत ही आसान है जब तक कि उसमे नकारात्मक विचार और भावनाओ का दखल ज्यादा नहीं है और जैसे ही हम अपने जीवन में इन बेकार की बातों को ज्यादा तबज़्ज़ो देने लगते है हम अपने ही आसपास एक दीवार बना लेते है जिसका असर हमारे जीवन के हर क्षेत्र  चाहे वह आर्थिक हो या पारिवारिक और चाहे सामाजिक हो या आध्यात्मिक हर क्षेत्र में हम अपने को कमजोर पाते है यही तो भावनाओ का खेल है। ....... ....... इसलिए विलियमजेनिंग्स ब्रायन  का ये कथन है कि 'भाग्य संयोग से  नहीं बनता। यह तो आपके विचारों के चयन से  बनता है "{विलियम जेनिंग्स ब्रायन }{अमेरिकी नेता ]जीवन पर  शतप्रतिशत लागू होता है। 

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

AHMIYAT

बड़े होते बच्चों की माँ की अहमियत क्या सचमुच  हो जाती है, या ये सिर्फ भ्रम है एक माँ का।  आज   फिर वो बेटे से कहती रह गई की कुछ खा लो और वो मशीन की तरह घर बाहर निकल गया। वो काम कर रही थी पर उसका मन तो 15 साल पहले की यादों में खो गया जब वो खुद बचपन से कुछ ही बड़ी हुई थी यु तो वो 21 साल की एक विवाहित युवती थी पर उसका बचपना अभी बाकि था शादी को दो साल हो गए थे। आज उसको पता चला की वो प्रेग्नेँट है तो एक  अजीब सा अहसास हुआ खुश  पर पता नहीं ये डर किस बात का था खैर  आज भी उसको ऐसा लगता है की कल की ही बात थी बेटे के समय उसका पूरा ख्याल रखा गया था बहुत ही आराम से समय निकल गया और फिर बेटे के जन्म का समय तो मनो बड़ा ही उत्सव का माहौल था। नासमझी की कोई बात ना हो जाये इसलिए उसने अपने एकमात्र शौक का भरपूर सदुपयोग किया था। उसका एकमात्र शौक था किताबें   पढ़ना और उसने बड़ी ही उम्दा किताबेँ पढ़ कर सब जानकारी पाली थी की न्यू बोर्न बेबी की परवरिश किस तरह की जाती है। और हर बात का ख्याल भी रखा उसने सिवाय अपने। फिर 5 साल का होते होते तो उसक बेटा सबकी आँखों का तारा बन गया जब बेटे की तारीफ़ होती तो वो गर्व से भर जाती है  आज भी। क्या दिन और क्या रात हर समय बस बेटे की ही तीमारदारी उसकिहि  जरूरतों का ध्यान और पति के काम के आलावा कुछ भी नहीं किया हाँ एक चीज जो नहीं छूटी वो थी उसकी पढ़ने की आदत कितनी भी थकान हो जाये पर कुछ पढ़ने को मिल जाए तो सारी थकान छूमंतर जाती थी.  बेटे को पढ़ाते समय  कुछ न कुछ पढ़ते रहना उसका बड़ा ही मनपसंद काम यु वो बढ़ी खुश रहती थी  कुछ कमी अपने   में लगती थी उसको। क्या पता नहीं जब अपने दोनों बच्चों की पढाई देखती तो संतुष्ट रहती और हमेशा की  इनमे  तो बड़ा होकर पड़ने का शौक हो ही जायेगा यु कोर्स का दोनों ही मन लगा कर पढ़ते हैं। पर उसको तो घर में वो ढेर सारी किताबों से भरा हुआ चाहती थी हर विषय की किताबें चाहे वो किसी महापुरुष की जीवनी हो या ,किसी विषय विज्ञानं की किताब और जब कुछ समय पहले उसके जन्मदिन पर बेटे ने उसकी पसंद की किताब "योगी कथामृत "ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ ए  योगी " ला कर दी तो वो तो निहाल ही हो गई अपने सपूत पर। उसने भी आदत के मुताबिक बड़ी ही जल्दी उस किताब को पूरा कर लिया और कुछ सोच कर उसको दुबारा पढ़ना शुरू कर दिया।
 .... ........ अवचेतन मे तो  किताब के कुछ अंश हमेशा ही चलायमान रहते और जीवन के दिन अपनी गति से चल रहे है  वो भी मन और अवचेतन मन मेंअपने  बेटे की अच्छाइयों को बढ़ावा देते हुए अब अपने जीवन से संतुष्ट रहे का प्रयास करके खुश थी हाँ अब उसे इस बात कीकोई  परवाह नहीं थी की उसके बच्चों के बड़े होने से उसकी अहमियत काम हो जाएगी क्यूंकि वक्त के साथ प्राथमिकताय बदल जाती है।
       ये बात उसको समझ में आ गई थी। और वो सब काम से फुर्सत हो कर फिर अपना मनपसंद काम करने बैठ गई थी। ........ 

avchetan ki avdharna: avchetan ki avdharna: Samsya ki pahchan

avchetan ki avdharna: avchetan ki avdharna: Samsya ki pahchan: avchetan ki avdharna: Samsya ki pahchan : " अरे ये तो रोज़ होता है "हाँ यही तो वो शब्द है जो रोज़ ही वो बोला करते है.वो से मतलब बच्च...

रविवार, 16 अप्रैल 2017

DO MAN

"सुबह उठते ही हाथ मशीन की तरह और दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है ,फिर भी समय की कमी हमेशा बनी रहती है क्या कुछ नहीं करती वो समय से जीतने की। हर रोज़ पर समय है कि उसको हमेशा मात दे वो देता है ,और वो चुपचाप फिर नई कोशिश करने में जुट जाती है। आज भी यही हो रहा था सुबह से और उसका मन तो कहीं और ही छलांगे लगा रहा था ,एक मन में रोज़ की रूटीन का मेनू चल रहा है और एक मन में तो जाने क्या चल रहा था ,खुश तो आज वो बहुत है पर क्यों ये तो उसका मन जाने या कहें अवचेतन में आज की तारीख को फिर याद करके जाने कितने नए विचार आ गए। आज से शायद  20 साल या कहें जब से उसे याद है उसने पहली बार अपने पिता को सत्यनारायण की कथा सुनाई थी और उन्होंने उसे 11 रूपये देकर कहा था खूब विद्या आये तुम्हारे पास और  बस उसने किताबों से बड़ी गहरी दोस्ती कर ली थी।   पिता के घर किताबों की कोई कमी नहीं थी। और उसको पढ़ने का शौक इस कदर था की , खाना -पीना ही भूल जाय , ज्योतिष,पुराण ,कीरो, ओशो  मासिक पत्रिकायें हो या अपने कक्षा की किताबें सब को घोल कर पिने का जूनून था कभी सोचा नहीं की इनके बहार भी दुनिया है। जब हस्तरेखा ज्योतिष पढ़ी तो मन पढाई से हट गया ,पर  कहीं और तो मन लगता ही नहीं फिर क्या  करें तब पिता ने उदासी का कारण जान कर पास बिठाया और पूछा क्या हुआ तो उसने रोते हुए बताया की उसके हाथ में विद्या की रेखा नहीं है।  ज्योतिष पिता ने हाथ पकड़ कर एक रेखा खींच दी और बोले ये रही विद्यारेखा, रेखाओं से कुछ नहीं होता कर्म से भाग्य को बदला जा सकता है  पाने घर में इतनी किताबें है की तुम पढ़ते पढ़ते थक  जाओ पर वो ख़त्म नहीं होंगी इनको पढ़ो। रही बात डिग्रीयो की तो डिग्रीयां ज्ञान नहीं देती ,ज्ञान किताबों में है और पढ़ करा उसे प्राप्त कारण आदमी के बस में।  10 साल की लड़की के कितने समझ में आया पता नहीं पर ये बातें उसके अवचेतन मन में हमेशा के लिए बैठ गई और  वो किताबों की हमेशा -हमेशा की दोस्त हो गई ,आज जब चैत्र पूर्णिमा आई तो25 साल पहली की घटना यु मन के किसी कोने से सामने आ कर कड़ी हो गई  जैसे कल की बात हो औरउसका मन इतना खुश है की पिता की गैरमौजूदगी का अहसास भी इस ख़ुशी  को काम नहीं कर पाई क्योकि इन्ही किताबों कारण ही तो पिता उसके अवचेतन में अभी भी बसें हुए  है और उसका    एक मन  बेटी बन कर हमेशा अपने पिता की इस सीख को सबके साथ बाटता रहता है। .........
       ....... ारे अरे ये क्या सब्जी जल जाएगी उसके एक मन ने उसे वापस रोज़ की दुनिया में खींच लाया और एक मन फिर खुश हो कर सोचने लगा की आज अधूरी किताब पूरी कारण है सब काम के बाद और उसके हाथ जल्दी -जल्दी काम निपटाने लगे। ........ ....... उसकी दोनों मन साथ साथ खुशी से मुस्काने लगे। ......... 

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

MAN KI BATIEN ,MAN HI JAANE.

"मन के कितने रूप है ये कोई कैसे जान सकता है ,जब भी समझने की कोशिश करो कुछ अलग ही समझ मिली मेरे मन की जाने कौन से लेकर मन की गति मन ही जाने तक की बातें बस मन ही करता है."                                    मन से आज फिर एक औरत का मन माँ के मन से फिर बहस हुई और माँ का मन जीत गया  ओरत फिर एक कोने में खड़ी देखती रह गई।........ मन के किसी कोने में फिर एक याद ने करवट ली और ओरत का मन फिर बेटी के मन से उलझ गया और फिर एक बेटी के मन की जीत हो गई ,बेटी इठलाती हुई आगे बढ़ गई और औरत का मन चुप -चाप देखता रहा।  ........ मन का आज फिर मन से समझौता हुआ आज फिर पत्नी ने औरत के मन को समझ दिया औरत का मन फिर किसी कोने में नहीं था बस मन के हर कोने में एक और मन था।
एक बेटी का मन ,एक माँ का मन ,एक पत्नी का मन। हाँ मन के हर मन में औरत ने अपने मन को मिला दिया और सब को मिला कर एक प्यारा सा मन बन गया जिसे दुनिया में कोई आज तक समझ नहीं सका जितना औरत के मन को समझने की कोशिश हुई उतने ही अविष्कार हो गए। कभी किसी ने औरत के मन को मोम कहा तो कभी बहता दरिया ,पर औरत का मन  हर कोई कैसे समझे  महादेवी वर्मा की लछमा का मन कोण समझ सकता है जब की आज भी हर औरत में वो थोड़ी सी बाकि है , प्रेमचंद की सुभागी भी तो हर बेटी के मन में बसी है चाहे एक गरीब की बेटी हो या आमिर की हर बेटी का सपना सुभागी की तरह ही है में ऐसा कुछ कर की मेरे पिता का सर गर्व से तन जाये आसमान के तारों से भी ज्यादा खुशियाँ हो मेरे पिता के आँगन में। ......
       और माँ की तो बात ही निराली है हर माँ का मन अपने  बच्चो की उन्नती को देखने की आस लगाए बैठा रहता है ,, किसी कोने में ये आस होती है जो मैंने नहीं किया वो मेरी संतान करेगी और बस यही से बस जिंदगी की शुरुआत और यही मन की आस के साथ जिंदगी को विराम पर नहीं औरत का मन कभी आस लगाना नहीं छोड़ता फिर एक नै आस एक नया विस्वास की अब सब मेरे मन के मुताबिक होगा। ..... मन फिर नई  गति से चल देता है अपना एक नया रूप लेकर कभी माँ का कभी बेटी का , या किसी और रूप में ही जिंदगी की रफ़्तार के साथ कदम मिलाने की उम्मीद के साथ। .......  मन की इस बात पर मन ने फिर मन से कहा की आज कुछ काम का मन नहीं है मन ने फिर  कहा ऐसा कैसे हो की काम न करना पड़े अब चलो अब कुछ काम करे मन। ........ 

रविवार, 2 अप्रैल 2017

''जब स्त्री शिक्षा की बात करे तो केवल हम स्कूल -कालेज की डिग्रीयों से  ही नहीं अपितु व्यावहारिक ज्ञान के साथ ही निर्णय लेने की क्षमता और सही समय पर सही काम करने का गुण भी उसके व्यक्तित्व का एक अभिन्न हिस्सा माना जाता है जब किसी स्त्री के पास भले ही डिग्री न हो पर बाकि गुण होने से वह हर क्षेत्र में सफल होने में सक्षम होती है। स्त्री की शिक्षा का रूप समय के हिसाब से बदलता रहा है ,जब प्राचीन काल में बहुत प्रतियोगता नहीं थी केवल जीवन के मूल्य ही प्राथमिक शिक्षा का रूप था और जब एक स्त्री को जीवन -मूल्य की अहमियत ज्ञात हो तो पूरा परिवार ही सही दिशा में प्रगति करता है ,परिवार के बच्चो में भी उन्ही गुणों का विकास सहज ही हो जाता है ,इसलिए महिलाये अपने परिवार की सभी अन्य महिलाओँ को सभी तरह की शिक्षा और गुण सिखाने की पुरी कोशिश करती है क्योकि कहा भी गया है एक पुरुष यदि किसी भी तरह का ज्ञान प्राप्त करता है तो वह केवल उस तक सीमित   होता है परंतु यदि एक स्त्री वही ज्ञान प्राप्त करती है तो  साथ -साथ अपने बच्चो और परिवार के साथ ही वह कोशिश करती है की एक दो और स्त्री भी वह ज्ञान बिना किसी शुल्क के उसके द्वारा ही प्राप्त करले ये स्त्री की कंजूसी नहीं कहलाती बल्कि ये देने की पृवत्ति  है  जो  उसको बचपन से ही सिखाया जाता है की सबको साथ लेकर चलना है। इन सब जीवन मूल्यों को तो स्त्री के जीवन का अभिन्न हिस्सा होना ही चाहिए साथ ही समय केअनुसार शिक्षा प्राप्त कर वह नए ज़माने की हर तरह के ज्ञान को आत्मसात करके अपने व्यक्तित्व को निखारती जाती है। यही एक स्त्री का नैसर्गिक गुण है जो हर युग में उसे महत्त्वपूर्ण बनाता है।"
                           स्त्री अपने बुद्धि विवेक से जब निर्णय लेती है तो वह सभी परिस्थितियों को जान कर उसको अमल में लती है इसके लिए उसको किसी डिग्री या सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं होती वह जब घर के लिये निर्णय लेती है तो पुरे परिवार का भला हो ऐसा सकती है, किसी विशेष व्यक्ति का नहीं  वहीँ यदि वह देश -समाज  या किसी और संस्था का  दायित्व अपने ऊपर लेती है तो जीजान से उसको पूर्ण करने का प्रयत्न  करती है।  यही  स्त्री का स्वभाव कहा गया है। ........ ........ स्त्री को सिर्फ स्कूल कॉलेज ही नहीं जीवन के हर क्षेत्र  में अपना सर्वश्रेष्ठ देना होता है और हर एक स्त्री अपने पुरे जीवन काल में  यही प्रयत्न करती रहती है। ....... 
                        

गुरुवार, 23 मार्च 2017

har yug me stree shiksha ka roop

" कुछ अलग विषय पर विचार आए तो कुछ अटपटा , अनमना सा मन किसी और ही दौर में पहुँच गया तो फिर उन विचारो को शब्दों में ढाला तो प्रश्न ही प्रश्न मन में घुमड़ने लगे और उत्तर भी खुद ही सूझने लगे पर क्या ये उत्तर सही होंगे। .........
         बहुत पीछे न जा कर एक युग पीछे मन चल पड़ा राम- कृष्ण के युग में मन में प्रश्न आया कि आम लोग कैसे अचार -व्यवहार करते होंगे कैसे नियम होंगे क्या नारी को शिक्षा का अधिकार होता होगा या आजादी से घूमने फिरने का मौका मिलता होगा। ...... हाँ क्यों जब रामायण -महाभारत पड़ते है तो ये कही स्पष्ट तौर पर तो नहीं लिखा पर घटनाओं को थोडे ध्यान देकर समझा जाये तो उन कालो में ही  नहीं वरन कलियुग में और हर शासन काल में स्त्री की शिक्षा घर के भीतर ही बहुत सुनियोजित तरीके से होती रही है। .... चाहे हम सीता की नहीं उनकी सखियों और दासियो की किसी बात विशेष पर ध्यान दे तो पाते है कि वो लोग निर्णय लेने में परिस्थितियों के अनुरूप सछम तो थी ही अपितु वे सही सलाह भी देती थी फिर चाहे तो कोई मने या मने ,कुछ उदाहरण बहुत मायने रखते है पुराणों में। . ..... द्धापर में स्त्री  शिक्षा देखने को मिलती है सभी स्त्री पात्रों को स्वनिर्णय लेते हुए पढ़ा जा सकता है चाहे वह गांधारी हो, कुंती हो,माद्री हो ,सुभद्रा हो,या द्रोपदी या रुक्मणी या राधा जिनको भी सिर्फ उनका चरित्र चित्रण पढ़े तो पाते है की ये सभी नारिया उच्च श्रेणी की बुद्धिजीवी थी और जब सबसे प्रचलित नायक कृष्ण की जीवनी में गोपियों को जानने की कोशिश करे तो उन्होंने तो उद्धव को भी प्रेम -भक्ति की और मोड़ देने में सफलता पाई थी यशोदा -देवकी ,रोहणी ,हो या कोई और पात्र सभी ज्ञान या कहे की बुद्धिमानी का परिचय देती जान पड़ती है। क्या उस युग में स्त्रियों को आज़ादी भी थी तो हाँ जब सुभद्रा ने अर्जुन को चुना या रुक्मणी ने कृष्ण को। यही नहीं पुराणों में और भी न जाने कितने स्त्री पात्र ऐसे है जिनको कुछ पन्नो में ही पढ़ कर भूल गए है पर उनके निर्णय ने युग निर्माण में और सही गलत के फैसलों में बहुत ही निर्णायक  भूमिका निभाई है ,जब भी किसी भी युग मै कुछ अति गंभीर या निर्णायक होता है तब स्त्री ही वो शक्ति है जो सब समेट की क्षमता रखती है। जिस भी  युग में देखे स्त्री को हर जगह सक्षम है। वो  किसी युग में बंधी हुई तो नहीं थी इस दृष्टि से देखें तो जब रावण ने सीता को अशोक वाटिका में रखा तो ये रावण का निर्णय था  साथ ये सीता की खुद का निर्णय भी था ये सीता के  व्यक्तित्व की दृढ़ता भी दर्शाती है। आगे की बातें अगले लेख है। ........

बुधवार, 22 मार्च 2017

MAN KI BAATEN

'मन को समझना बड़ा मुश्किल है ,कब खुश हो जाये कब उदास यूं ही मुस्कुराने लगे या गाने लगे जब सारा जग किसी समस्या से परेशान हो  और आपका  मन  नाचने को करे तो क्या कीजिये इस दिल का , जब आप किसी की उदासी में शामिल हो और आपका चेहरे पर बार -बार मुस्कान बिखर जाये और आप अपने को संयत करने की लाख कोशिश करो पर आप का मन आपकी एक न सुने  "      .........  बस  यही वो स्थिति है  जब आप खुद के बारे में जानने की हर संभव प्रयास तो करते हो पर जान नहीं पाते  और  बस एक कोना ढूढ़ कर बस बैठना चाहते हो जहाँ आप अपने आप को समझने की पुरजोर कोशिश  करते  हुए भी अपने को पा नहीं पाते और मन -मस्तिष्क में  जोरदार  टकराव होता कि क्या दुनिया में सब अच्छा है  या  दुनिया  में  सब जैसा हम देखते वैसा ही दिखता  है  बस इसी कश्मकश में दिन -रात बीतते जाते है जिंदगी की रफ़्तार अपनी गति से  चलती जाती है  ,और मन की गति उससे भी दुगनी या दस गुनीगति  से चलता जाता है हम उदास होते ही तो मन भविष्य में ख़ुशी खोजता है जब  भविष्य में कठिनाई दिखाई देती है  तो भूतकाल की किसी ख़ुशी को पकड़ कर खुश हो लेता  है  यही तो   मन  की  अपनी दुनिया है  बस उसको कोई हद में रोक नहीं सकता। ........
                       यही बात तो मन की शायद अनोखी है जब लगता है की ,सब कुछ ख़त्म होने वाला है तब मन के किसी कोने से आवाज़ आती है सब ठीक हो जाएगा। ... और फिर जिंदगी अपनी  रफ़्तार  से चल पड़ती है और मन किसी कोने में  दुबक कर  जिंदगी  की दौड़ में हमे भागते देखता रहता है ,और  फिर अपनी ही दुनिया में खुश होता रहता है। ....... मन की बातें मन ही जाने  हम तो बस  यूँ ही जिए जाते है।  ........ 

बुधवार, 15 मार्च 2017

avchetan ki avdharna: Samsya ki pahchan

avchetan ki avdharna: Samsya ki pahchan: " अरे ये तो रोज़ होता है "हाँ यही तो वो शब्द है जो रोज़ ही वो बोला करते है.वो से मतलब बच्चे जो दिनभर ही यहाँ वहां  घुमा करते है। ज...

Samsya ki pahchan


" अरे ये तो रोज़ होता है "हाँ यही तो वो शब्द है जो रोज़ ही वो बोला करते है.वो से मतलब बच्चे जो दिनभर ही यहाँ वहां  घुमा करते है। जब भी उनको बोलो की पढाई करलो या कुछ और काम तो उनको बड़ी ही ऊब आती है पर क्या बच्चो के मन में कुछ ऐसा चल रहा  होता है कि हम बड़े जब भी उनको कुछ कहने वाले होते है वो समझ जाते कि ऐसा तो रोज़ ही होता है और वो सब समझने का नाटक करते है और हम बड़े अपने बड़प्पन में उनके मन की बात समझने की कोई भी तरह से तैयार ही नहीं होते जबकि बच्चो का मन या कहे अवचेतन मन बहुत ही  सरल तरीके से कठिन  बात  या  समस्या का हल ढूंढने में सक्षम होता है। हम जब  भी हताश या निराश हो तो बच्चो की दिनचर्या कुछ ज्यादा ध्यान से देखे तो पाएंगे की उनके तो खेल में ही हमारी समस्या का निदान होता है बस थोड़ा रुक कर और
शांत मन से हम यदि जिंदगी को बच्चो के नज़रिए से देखें तो हर परेशानी का हल हमारे पास होता है, पर हम इस दौड़ धुप की वजह से ये समझ ही नहीं पाते की जिसे हम परेशानी समझ रहे है वो तो खुद में एक अवसर है,हमे और सक्षम बनाने का और हम उस परेशानी में अपने आप को तो कमजोर करते ही है साथ ही अपने आसपास के लोगो को भी परेशानी में डाल देते है ,लेकिन बच्चों की तरह सोचने से कई बार हल तो मिलता ही है,और हमारा मन भी प्रसन्न होता है जिससे हमारा जीवन सकारात्मकता पूर्ण हो जाता है और   हम  जीवन की एक सीढ़ी आगे बढ़ने में सफल होते है   तभी तो  हम कह सकते है कि" ये तो रोज़ होता है "   जब हम इस तरह जीवन की हर बात को अपने सकारात्मक द्रष्टिकोण से देखते है तब ही तो अपने बच्चों को भी वही नज़रिया दे पाते  है और वे अपने भविष्य में सकारात्मक द्रष्टिकोण को अपना कर एक सफल व्यक्ति के रूप में अपनी पहचान बनाते है।   .... .... ....... 

बुधवार, 8 मार्च 2017

Nari ka avchetan man

           आज महिला दिवस पर हर तरफ़ बड़ा ही अच्छा माहौल बन गया है। अख़बार हो टेलीविज़न के चैनल हर जगह बस महिलाओं की बातें की जा रही है ,कितनी उपलब्धियॉ पाई महिलाओं ने ,कितनी पाई जानी बाकी है अभी  और भी जाने क्या -क्या  बहुत  अच्छा है ये सब वास्तव में महिला हर उस चीज़ या कहे कि हर उस सम्मान और अधिकार की  हक़दार है जो कि इस समाज में उपलब्ध है। आज अखबार के पन्ने भरे हुये है महिलाओं की कहानियो से और उसको क्या कितना  मिला और कितना मिलना चाहिए।
            ये तो हुई बाहर की बाते पर हम यहाँ पर स्त्री के मन से भी परे उसके अवचेतन मन की बात करते है ,जब से दुनिया अस्तित्व में आई तो सबसे पहले कोण आया आदम या हब्बा ये तो कोई खास बात नहीं है शायद दोनों को साथ में प्रभु ने धरती पर भेजा होगा क्योंकि उसको अपनी सृष्टि की रचना में पुरूष के बराबर ही स्त्री के महत्व का भान था। उस परमपिता को कोई संदेह नहीं था अपनी इस अद्भुत रचना पर जो उसकी सृष्टि में बराबर की सहभागी थी और है। हर युग में उसने  नारी को हर तरह से सक्षम बनाया है ,नारी को ईश्वर ने अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना बताया है। महिलाओ को किसी विशेष दिन में कोई भले ही सम्मान की बात करे पर उस सृष्टि के रचयिता ने एक नारी की कोख़  से जन्म ले लेकर उसको माँ की पदवी दे कर बहुत ही सम्मान दिया है ,उसका कोई मोल नहीं है।
              स्त्री का व्यक्तित्व अपने आप में संपुर्ण है उसके अवचेतन में हमेशा ही एक बात रहती है की कैसे अपने परिवार ,समाज ,और देश -दुनिया का भला करू। हर परिस्थिति से उठ कर फिर आगे बढ़ना और सकारत्मकता के साथ हर घटना को सहज रूप से स्वीकारना हर नारी का नैसर्गिक गुण होता है ,महिलाओ की सहज प्रवत्ति है दूसरों  की मदद करना। नारी मन के बारे में कवियों को कहने में ही एकअद्भुत  रचना का सृजन हो जाता है।  स्त्री के मन की तो गहराई इतनी है कि अपने पुत्र को मारने वाले अस्वत्थामा को भी द्रौपती ने छमा कर दिया था ,........      .
                 अवचेतन मन में कितनी ही कड़वी बाते हो पर अपने फ़र्ज़ को हमेशा ही प्राथमिकता से निभाने वाली महिलाओ के लिये तो शव्द भी काम पद जाये

    "कांच नहीं है औरत जो ठोकर से टूट जाएगी ,ये वो कोमल मिट्टी है जो हर साँचे में ढल जाएगी।
      परिस्थितयो की आग  में तप कर  वो पक्की हो जाती है ,टूट कर फिर वो नई शक्ल में आ जाती है "
                                         "महिला दिवस की शुभकामनाऍ "

शनिवार, 4 मार्च 2017

avchetan man ka rahasya

अवचेतन मन का रहस्य क्या कोई विज्ञानं कोई या अध्यात्म समझा सकता है ,शायद हाँ और शायद नहीं क्योंकि ईश्वर ने जब संसार का निर्माण किया तब ईश्वर के अवचेतन में भी तो पहले इस संसार का निर्माण हो चुका था !उस परम शक्ति ने कितना महान विचार अपने अवचेतन में लाया होगा कि इस संसार के कण -कण का निर्माण हुआ, मनुष्य के  एक छोटे से तिनके के समान मन में जब इतने विचार आते है कि एक और संसार का  निर्माण हो जाये ,मनुष्य के अपने जीवन में जो घटनाए घटित होती है ,उसके  मन में उनको लेकर एक और दुनिया बनती है। जैसे यदि किसी के जीवन में कोई दुःखद घटना घटती है तो उसके सामाजिक जीवन जो बदलाव आता है उसके साथ -साथ उसके अवचेतन मन पर भी प्रभाव बहुत गहरा होता है और मनुष्य अपने मन में अनेको विचार लाता है कि ऐसा हुआ तो क्या होगा ऐसा नही होता तो कुछ और परिस्थिति होती ,मनुष्य के अवचेतन में तो इतने सारे पहलु एक ही घटना के होते है कि वह खुद ही नहीं समझ पाता कि क्या सही है और क्या सिर्फ विचार अवचेतन मन के रहस्य को साधारण मनुष्य समझने के प्रयास में ही उलझा रहता है।
                 अवचेतन मन की छोटी सी झलक ही साधारण मनुष्य के जीवन में वह देख पाता है अन्यथा वह तो अपनी दिनचर्या की आपाधापी में उसकी उपेक्षा कर आगे की घटनाओं और परिस्थिति पर ध्यान केंद्रित करते है और मनुष्य का अवचेतन मन फिर किसी और घटना या कहानी को अपने ढंग से परिभाषित करके उसी को सत्य की कसौटी पर परखने की कोशिश करने में अपने आप को व्यस्त कर लेता है।
                हर एक व्यक्ति जीवन में जो भी घटना घटती है चाहे वह सुख की हो या दुख की उसका अवचेतन में यदि उस घटना को ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया तो उसके भविष्य पर उस का गहरा प्रभाव नज़र आएगा। यदि व्यक्ति ने उस घटना को सकारात्मक रूप से अपनाया है तो आगे भविष्य में उन्नति के या सही मार्ग के अवसर आएंगे और यदि उसके भीतर नकारात्मक विचारों का प्रभाव अधिक है तो ,उसको कठिन परिस्थितियों का अधिक सामना करना पड़ेगा इसीलिए पूर्वजो का कहना रहता था कि "जो होता है अच्छे के लिए होता है "जिससे मनुष्य नकारात्मक परिस्थितियों में भी अच्छा महसूस कर सके।  ... .... 

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

avchetan me kitabon ki baaten

"जब से हिंदी पढ़ना सीखा तब से पता नहीं क्या,और कितना पढ़ा पर जो पढ़ा वह कभी न कभी कहीं न कहीं याद आ ही जाता है। छोटी -छोटी कहानियाँ  हो या कोई लेख जब भी कोई ऐसा वक़्त हो तो हमारा अवचेतन उन कहानी और उस घटना मे समानता ढूंढने की कोशिश  जरूर करता है ,पिछले साल बेटे को हिन्दी पढ़ाते हुए उसका एक  पाठ  'प्रेमचंद के फटे जूते ' पता नहीं क्यों मन के किसी कोने में समां गई ,शायद हरिशंकर परसाई जी की रचना है ,तब से हर समय हर एक बात में अपने मन में ये बात सोचती हूँ कि क्या सम्भावना हो सकती कितने विचार इस परिस्थिति में किसी के मन में आ सकते  है ,अब जब की इतने दिनों बाद फिर उस लेख की कुछ बातें मन में आ रही है  क्योंकि आज कही जाते -जाते मेरी भी चप्पल टूट गई और मुझे अपने आप पर बड़ा गुस्सा आया की पहले क्यों नहीं देखा ,अब क्या-क्या परेशानी हो सकती है कितना समय बर्बाद होगा। .. बगैरह -बगैरह और ये सब सोचते -सोचते में मन कब प्रेमचंद के फटे जूते के बारे में सोचने लगा पता ही नहीं चला। फिर अपने आप ही बड़ी हँसी आई। हा हा हा हा : एक तरफ तो हाथ जल्दी -जल्दी  काम निपटा रहे है दिमाग ये सोच रहा की अब क्या करू  और मन में तो उस वक्त और बर्तमान में तुलना करके  अपने ही में मस्त था । परसाई जी ने तो प्रेमचंदजी की एक तस्वीर को देखकर उस वक्त की सारी अच्छाई और परेशानिया का ज़िक्र ऐसे कर दिया की सबकुछ इन्ही के सामने घटित हुआ है.i पर क्या हम भी किसी परिस्थिति को देखकर उसका विश्लेषण कुछ हट कर नहीं कर सकते।   ... 
             अरे अरे मेरा मन तो आज में आ ही नहीं रहा पर अभी तो सबसे जरुरी काम है अपनी चप्पल की व्यवस्था करना वरना बाहर जाने का प्रोग्राम ही निरस्त न करना पद जाये। .... 
       ये बात सच है कि हमारा मन हमे किसी परिस्थिति को कुछ अलग तरह से सोचने की और मोड़ता है बस ये हमारे ऊपर निर्भर करता है की हम स्थिति से कैसे बहार आये। ..... 

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

"विचारों से ही हमारा व्यक्तित्व बनता है। हमारे जैसे विचार अवचेतन मन में चलते है , वही विचार  हमारे आने वाले  कल का निर्माण करते है। हर एक का अपना  एक नज़रिया होता है ,जिस तरह वो  अपने आसपास की हर घटना को अपने मन -मस्तिष्क में जिस भी तरह से ग्रहण करता है , वो अलग होता  है और बाहर के लिए वह एक अलग द्रष्टिकोण रखता है।"
             "अवचेतन मन में हमेशा अलग विचार चलते  रहते है ,हमारा  अवचेतन बहुत शक्तिशाली है वो हर परिस्थिति को अपने हिसाब से ढाल लेता है ,या यूँ कहे कि अवचेतन मन में जिस घटना को जिस रूप में अपनाया है ,उसी पर हमारा भविष्य टिका होता है  , हमारे अवचेतन पर वही अंकित  होता  है जैसा  वो  महसूस करता है जब से हम सोचने लगते है ,तभी  से  हमारे मन -मस्तिष्क में  एक प्रक्रिया  के तहत  धारणा बन जाती है और वो हमारे अवचेतन में हर घटना को  अपने एक  सकारात्मक या नकारात्मक नज़रिये का जामा पहना कर उस घटना को बहुत बड़ी या छोटी बनालेता है , हमारा जीवन इसी बात पर निर्भर करता  है कि हमारे रोज़ की दिनचर्या में जो भी घटित हो रहा है उसको हमारा अवचेतन मन किस रूप में ले  रहा है।
               अवचेतन मन में हमेशा भूतकाल की घटनाओं का प्रभाव रहता है उसी पर आपका व्यक्तित्व बनता है जैसे किसी के बचपन में कोई अपना मृत्यु को प्राप्त हो जाये तो या वह मृत्यु से डरने लगेगा या मृत्यु को जीवन का एक हिस्सा समझ कर उसे स्वीकार कर लेगा। उसी तरह हर अच्छी या बुरी घटना को हमारा मन कैसे स्वीकार करता है ,यही नजरिया हमारे भविष्य  की सफ़लता और असफ़लता में भूमिका निभाता है। "
                जब हम पढ़ते है ,जब हम सोते है जब हम घूमने जाते है या हम यूँ कह सकते है कि हमारा अवचेतन मन हमसे अलग़ हमेशा अपनी दुनिया में मशगूल रहता है। ,

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

avchetan man

"केवल एक विचार ही आपका जीवन बना या बिगाड़ सकता है। "
"विचार कर्म का बीज है "
बरसों या दशको या यूगों से भी पहले जब पृथ्वी पर जीवन था या नही !या जीवन की शुरूआत होने वाली थी
तब उस परम शक्ति ने विचार किया होगा I हाँ विचार ही तो पहले आया होगा तभी तो सृष्टि की ,ब्रम्हांड की ,
पृथ्वी की और सौर मण्डल में जीवन की उत्पत्ती हुई होगी I विचारों के बल पर ही ब्रह्मांड की रचना हुई होगी
रचना हुई सृष्टि की , भौतिक विश्व से पहले सृष्टि के  रचयिता ने विचारों में ब्रह्मांड की रचना की।
ब्रह्मांड की रचना या भौतिक जगत का निर्माण विचारों ही हुआ l
              यही रचनात्मक सिद्धान्त है "विश्व में किसी भी वस्तु का भौतिक निर्माण होने से पहले उसका वैचारिक निर्माण  होता है "l
           हाँ यही सत्य है  आप अपने विचारों से अपने ब्रम्हांड या कहे की अपना जीवन बना सकते है अच्छे या
बुरे पर   जैसे आपके विचार होंगे वैसा ही आपका जीवन का स्वरूप होगा आपके विचारों की शक्ति आपके जीवन के हर   क्षेत्र में आपकी स्थिति तय करती है ,आपका जीवन जैसा भी है सफल या संघर्षपुर्ण ये एकमात्र आपके
विचारों के कारण ही होता है
              हाँ ये हमारे और सिर्फ हमारे विचारों का परिणाम है कि हम कैसा जीवन जी रहे है हर हाल में ख़ुश या
हर समय चिंता से भरे हुए l
हमे हमारे मन के विचारों को परखना होगा ये क्या  है, कैसे है, जब हम अपने विचारों के दृष्टा बनकर उन्हें जानेंगे तब हम समझेंगे की सचमुच हमारे विचार ही हमारे भविष्य की सीढी है !हमारे मन या कहें की अवचेतन मन की देन है हमारा भविष्य
                   " विचारोँ से भावना बनती और भावना से भविष्य "