"जब से हिंदी पढ़ना सीखा तब से पता नहीं क्या,और कितना पढ़ा पर जो पढ़ा वह कभी न कभी कहीं न कहीं याद आ ही जाता है। छोटी -छोटी कहानियाँ हो या कोई लेख जब भी कोई ऐसा वक़्त हो तो हमारा अवचेतन उन कहानी और उस घटना मे समानता ढूंढने की कोशिश जरूर करता है ,पिछले साल बेटे को हिन्दी पढ़ाते हुए उसका एक पाठ 'प्रेमचंद के फटे जूते ' पता नहीं क्यों मन के किसी कोने में समां गई ,शायद हरिशंकर परसाई जी की रचना है ,तब से हर समय हर एक बात में अपने मन में ये बात सोचती हूँ कि क्या सम्भावना हो सकती कितने विचार इस परिस्थिति में किसी के मन में आ सकते है ,अब जब की इतने दिनों बाद फिर उस लेख की कुछ बातें मन में आ रही है क्योंकि आज कही जाते -जाते मेरी भी चप्पल टूट गई और मुझे अपने आप पर बड़ा गुस्सा आया की पहले क्यों नहीं देखा ,अब क्या-क्या परेशानी हो सकती है कितना समय बर्बाद होगा। .. बगैरह -बगैरह और ये सब सोचते -सोचते में मन कब प्रेमचंद के फटे जूते के बारे में सोचने लगा पता ही नहीं चला। फिर अपने आप ही बड़ी हँसी आई। हा हा हा हा : एक तरफ तो हाथ जल्दी -जल्दी काम निपटा रहे है दिमाग ये सोच रहा की अब क्या करू और मन में तो उस वक्त और बर्तमान में तुलना करके अपने ही में मस्त था । परसाई जी ने तो प्रेमचंदजी की एक तस्वीर को देखकर उस वक्त की सारी अच्छाई और परेशानिया का ज़िक्र ऐसे कर दिया की सबकुछ इन्ही के सामने घटित हुआ है.i पर क्या हम भी किसी परिस्थिति को देखकर उसका विश्लेषण कुछ हट कर नहीं कर सकते। ...
अरे अरे मेरा मन तो आज में आ ही नहीं रहा पर अभी तो सबसे जरुरी काम है अपनी चप्पल की व्यवस्था करना वरना बाहर जाने का प्रोग्राम ही निरस्त न करना पद जाये। ....
ये बात सच है कि हमारा मन हमे किसी परिस्थिति को कुछ अलग तरह से सोचने की और मोड़ता है बस ये हमारे ऊपर निर्भर करता है की हम स्थिति से कैसे बहार आये। .....