गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

AHMIYAT

बड़े होते बच्चों की माँ की अहमियत क्या सचमुच  हो जाती है, या ये सिर्फ भ्रम है एक माँ का।  आज   फिर वो बेटे से कहती रह गई की कुछ खा लो और वो मशीन की तरह घर बाहर निकल गया। वो काम कर रही थी पर उसका मन तो 15 साल पहले की यादों में खो गया जब वो खुद बचपन से कुछ ही बड़ी हुई थी यु तो वो 21 साल की एक विवाहित युवती थी पर उसका बचपना अभी बाकि था शादी को दो साल हो गए थे। आज उसको पता चला की वो प्रेग्नेँट है तो एक  अजीब सा अहसास हुआ खुश  पर पता नहीं ये डर किस बात का था खैर  आज भी उसको ऐसा लगता है की कल की ही बात थी बेटे के समय उसका पूरा ख्याल रखा गया था बहुत ही आराम से समय निकल गया और फिर बेटे के जन्म का समय तो मनो बड़ा ही उत्सव का माहौल था। नासमझी की कोई बात ना हो जाये इसलिए उसने अपने एकमात्र शौक का भरपूर सदुपयोग किया था। उसका एकमात्र शौक था किताबें   पढ़ना और उसने बड़ी ही उम्दा किताबेँ पढ़ कर सब जानकारी पाली थी की न्यू बोर्न बेबी की परवरिश किस तरह की जाती है। और हर बात का ख्याल भी रखा उसने सिवाय अपने। फिर 5 साल का होते होते तो उसक बेटा सबकी आँखों का तारा बन गया जब बेटे की तारीफ़ होती तो वो गर्व से भर जाती है  आज भी। क्या दिन और क्या रात हर समय बस बेटे की ही तीमारदारी उसकिहि  जरूरतों का ध्यान और पति के काम के आलावा कुछ भी नहीं किया हाँ एक चीज जो नहीं छूटी वो थी उसकी पढ़ने की आदत कितनी भी थकान हो जाये पर कुछ पढ़ने को मिल जाए तो सारी थकान छूमंतर जाती थी.  बेटे को पढ़ाते समय  कुछ न कुछ पढ़ते रहना उसका बड़ा ही मनपसंद काम यु वो बढ़ी खुश रहती थी  कुछ कमी अपने   में लगती थी उसको। क्या पता नहीं जब अपने दोनों बच्चों की पढाई देखती तो संतुष्ट रहती और हमेशा की  इनमे  तो बड़ा होकर पड़ने का शौक हो ही जायेगा यु कोर्स का दोनों ही मन लगा कर पढ़ते हैं। पर उसको तो घर में वो ढेर सारी किताबों से भरा हुआ चाहती थी हर विषय की किताबें चाहे वो किसी महापुरुष की जीवनी हो या ,किसी विषय विज्ञानं की किताब और जब कुछ समय पहले उसके जन्मदिन पर बेटे ने उसकी पसंद की किताब "योगी कथामृत "ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ ए  योगी " ला कर दी तो वो तो निहाल ही हो गई अपने सपूत पर। उसने भी आदत के मुताबिक बड़ी ही जल्दी उस किताब को पूरा कर लिया और कुछ सोच कर उसको दुबारा पढ़ना शुरू कर दिया।
 .... ........ अवचेतन मे तो  किताब के कुछ अंश हमेशा ही चलायमान रहते और जीवन के दिन अपनी गति से चल रहे है  वो भी मन और अवचेतन मन मेंअपने  बेटे की अच्छाइयों को बढ़ावा देते हुए अब अपने जीवन से संतुष्ट रहे का प्रयास करके खुश थी हाँ अब उसे इस बात कीकोई  परवाह नहीं थी की उसके बच्चों के बड़े होने से उसकी अहमियत काम हो जाएगी क्यूंकि वक्त के साथ प्राथमिकताय बदल जाती है।
       ये बात उसको समझ में आ गई थी। और वो सब काम से फुर्सत हो कर फिर अपना मनपसंद काम करने बैठ गई थी। ........ 

avchetan ki avdharna: avchetan ki avdharna: Samsya ki pahchan

avchetan ki avdharna: avchetan ki avdharna: Samsya ki pahchan: avchetan ki avdharna: Samsya ki pahchan : " अरे ये तो रोज़ होता है "हाँ यही तो वो शब्द है जो रोज़ ही वो बोला करते है.वो से मतलब बच्च...

रविवार, 16 अप्रैल 2017

DO MAN

"सुबह उठते ही हाथ मशीन की तरह और दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है ,फिर भी समय की कमी हमेशा बनी रहती है क्या कुछ नहीं करती वो समय से जीतने की। हर रोज़ पर समय है कि उसको हमेशा मात दे वो देता है ,और वो चुपचाप फिर नई कोशिश करने में जुट जाती है। आज भी यही हो रहा था सुबह से और उसका मन तो कहीं और ही छलांगे लगा रहा था ,एक मन में रोज़ की रूटीन का मेनू चल रहा है और एक मन में तो जाने क्या चल रहा था ,खुश तो आज वो बहुत है पर क्यों ये तो उसका मन जाने या कहें अवचेतन में आज की तारीख को फिर याद करके जाने कितने नए विचार आ गए। आज से शायद  20 साल या कहें जब से उसे याद है उसने पहली बार अपने पिता को सत्यनारायण की कथा सुनाई थी और उन्होंने उसे 11 रूपये देकर कहा था खूब विद्या आये तुम्हारे पास और  बस उसने किताबों से बड़ी गहरी दोस्ती कर ली थी।   पिता के घर किताबों की कोई कमी नहीं थी। और उसको पढ़ने का शौक इस कदर था की , खाना -पीना ही भूल जाय , ज्योतिष,पुराण ,कीरो, ओशो  मासिक पत्रिकायें हो या अपने कक्षा की किताबें सब को घोल कर पिने का जूनून था कभी सोचा नहीं की इनके बहार भी दुनिया है। जब हस्तरेखा ज्योतिष पढ़ी तो मन पढाई से हट गया ,पर  कहीं और तो मन लगता ही नहीं फिर क्या  करें तब पिता ने उदासी का कारण जान कर पास बिठाया और पूछा क्या हुआ तो उसने रोते हुए बताया की उसके हाथ में विद्या की रेखा नहीं है।  ज्योतिष पिता ने हाथ पकड़ कर एक रेखा खींच दी और बोले ये रही विद्यारेखा, रेखाओं से कुछ नहीं होता कर्म से भाग्य को बदला जा सकता है  पाने घर में इतनी किताबें है की तुम पढ़ते पढ़ते थक  जाओ पर वो ख़त्म नहीं होंगी इनको पढ़ो। रही बात डिग्रीयो की तो डिग्रीयां ज्ञान नहीं देती ,ज्ञान किताबों में है और पढ़ करा उसे प्राप्त कारण आदमी के बस में।  10 साल की लड़की के कितने समझ में आया पता नहीं पर ये बातें उसके अवचेतन मन में हमेशा के लिए बैठ गई और  वो किताबों की हमेशा -हमेशा की दोस्त हो गई ,आज जब चैत्र पूर्णिमा आई तो25 साल पहली की घटना यु मन के किसी कोने से सामने आ कर कड़ी हो गई  जैसे कल की बात हो औरउसका मन इतना खुश है की पिता की गैरमौजूदगी का अहसास भी इस ख़ुशी  को काम नहीं कर पाई क्योकि इन्ही किताबों कारण ही तो पिता उसके अवचेतन में अभी भी बसें हुए  है और उसका    एक मन  बेटी बन कर हमेशा अपने पिता की इस सीख को सबके साथ बाटता रहता है। .........
       ....... ारे अरे ये क्या सब्जी जल जाएगी उसके एक मन ने उसे वापस रोज़ की दुनिया में खींच लाया और एक मन फिर खुश हो कर सोचने लगा की आज अधूरी किताब पूरी कारण है सब काम के बाद और उसके हाथ जल्दी -जल्दी काम निपटाने लगे। ........ ....... उसकी दोनों मन साथ साथ खुशी से मुस्काने लगे। ......... 

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

MAN KI BATIEN ,MAN HI JAANE.

"मन के कितने रूप है ये कोई कैसे जान सकता है ,जब भी समझने की कोशिश करो कुछ अलग ही समझ मिली मेरे मन की जाने कौन से लेकर मन की गति मन ही जाने तक की बातें बस मन ही करता है."                                    मन से आज फिर एक औरत का मन माँ के मन से फिर बहस हुई और माँ का मन जीत गया  ओरत फिर एक कोने में खड़ी देखती रह गई।........ मन के किसी कोने में फिर एक याद ने करवट ली और ओरत का मन फिर बेटी के मन से उलझ गया और फिर एक बेटी के मन की जीत हो गई ,बेटी इठलाती हुई आगे बढ़ गई और औरत का मन चुप -चाप देखता रहा।  ........ मन का आज फिर मन से समझौता हुआ आज फिर पत्नी ने औरत के मन को समझ दिया औरत का मन फिर किसी कोने में नहीं था बस मन के हर कोने में एक और मन था।
एक बेटी का मन ,एक माँ का मन ,एक पत्नी का मन। हाँ मन के हर मन में औरत ने अपने मन को मिला दिया और सब को मिला कर एक प्यारा सा मन बन गया जिसे दुनिया में कोई आज तक समझ नहीं सका जितना औरत के मन को समझने की कोशिश हुई उतने ही अविष्कार हो गए। कभी किसी ने औरत के मन को मोम कहा तो कभी बहता दरिया ,पर औरत का मन  हर कोई कैसे समझे  महादेवी वर्मा की लछमा का मन कोण समझ सकता है जब की आज भी हर औरत में वो थोड़ी सी बाकि है , प्रेमचंद की सुभागी भी तो हर बेटी के मन में बसी है चाहे एक गरीब की बेटी हो या आमिर की हर बेटी का सपना सुभागी की तरह ही है में ऐसा कुछ कर की मेरे पिता का सर गर्व से तन जाये आसमान के तारों से भी ज्यादा खुशियाँ हो मेरे पिता के आँगन में। ......
       और माँ की तो बात ही निराली है हर माँ का मन अपने  बच्चो की उन्नती को देखने की आस लगाए बैठा रहता है ,, किसी कोने में ये आस होती है जो मैंने नहीं किया वो मेरी संतान करेगी और बस यही से बस जिंदगी की शुरुआत और यही मन की आस के साथ जिंदगी को विराम पर नहीं औरत का मन कभी आस लगाना नहीं छोड़ता फिर एक नै आस एक नया विस्वास की अब सब मेरे मन के मुताबिक होगा। ..... मन फिर नई  गति से चल देता है अपना एक नया रूप लेकर कभी माँ का कभी बेटी का , या किसी और रूप में ही जिंदगी की रफ़्तार के साथ कदम मिलाने की उम्मीद के साथ। .......  मन की इस बात पर मन ने फिर मन से कहा की आज कुछ काम का मन नहीं है मन ने फिर  कहा ऐसा कैसे हो की काम न करना पड़े अब चलो अब कुछ काम करे मन। ........ 

रविवार, 2 अप्रैल 2017

''जब स्त्री शिक्षा की बात करे तो केवल हम स्कूल -कालेज की डिग्रीयों से  ही नहीं अपितु व्यावहारिक ज्ञान के साथ ही निर्णय लेने की क्षमता और सही समय पर सही काम करने का गुण भी उसके व्यक्तित्व का एक अभिन्न हिस्सा माना जाता है जब किसी स्त्री के पास भले ही डिग्री न हो पर बाकि गुण होने से वह हर क्षेत्र में सफल होने में सक्षम होती है। स्त्री की शिक्षा का रूप समय के हिसाब से बदलता रहा है ,जब प्राचीन काल में बहुत प्रतियोगता नहीं थी केवल जीवन के मूल्य ही प्राथमिक शिक्षा का रूप था और जब एक स्त्री को जीवन -मूल्य की अहमियत ज्ञात हो तो पूरा परिवार ही सही दिशा में प्रगति करता है ,परिवार के बच्चो में भी उन्ही गुणों का विकास सहज ही हो जाता है ,इसलिए महिलाये अपने परिवार की सभी अन्य महिलाओँ को सभी तरह की शिक्षा और गुण सिखाने की पुरी कोशिश करती है क्योकि कहा भी गया है एक पुरुष यदि किसी भी तरह का ज्ञान प्राप्त करता है तो वह केवल उस तक सीमित   होता है परंतु यदि एक स्त्री वही ज्ञान प्राप्त करती है तो  साथ -साथ अपने बच्चो और परिवार के साथ ही वह कोशिश करती है की एक दो और स्त्री भी वह ज्ञान बिना किसी शुल्क के उसके द्वारा ही प्राप्त करले ये स्त्री की कंजूसी नहीं कहलाती बल्कि ये देने की पृवत्ति  है  जो  उसको बचपन से ही सिखाया जाता है की सबको साथ लेकर चलना है। इन सब जीवन मूल्यों को तो स्त्री के जीवन का अभिन्न हिस्सा होना ही चाहिए साथ ही समय केअनुसार शिक्षा प्राप्त कर वह नए ज़माने की हर तरह के ज्ञान को आत्मसात करके अपने व्यक्तित्व को निखारती जाती है। यही एक स्त्री का नैसर्गिक गुण है जो हर युग में उसे महत्त्वपूर्ण बनाता है।"
                           स्त्री अपने बुद्धि विवेक से जब निर्णय लेती है तो वह सभी परिस्थितियों को जान कर उसको अमल में लती है इसके लिए उसको किसी डिग्री या सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं होती वह जब घर के लिये निर्णय लेती है तो पुरे परिवार का भला हो ऐसा सकती है, किसी विशेष व्यक्ति का नहीं  वहीँ यदि वह देश -समाज  या किसी और संस्था का  दायित्व अपने ऊपर लेती है तो जीजान से उसको पूर्ण करने का प्रयत्न  करती है।  यही  स्त्री का स्वभाव कहा गया है। ........ ........ स्त्री को सिर्फ स्कूल कॉलेज ही नहीं जीवन के हर क्षेत्र  में अपना सर्वश्रेष्ठ देना होता है और हर एक स्त्री अपने पुरे जीवन काल में  यही प्रयत्न करती रहती है। .......