बड़े होते बच्चों की माँ की अहमियत क्या सचमुच हो जाती है, या ये सिर्फ भ्रम है एक माँ का। आज फिर वो बेटे से कहती रह गई की कुछ खा लो और वो मशीन की तरह घर बाहर निकल गया। वो काम कर रही थी पर उसका मन तो 15 साल पहले की यादों में खो गया जब वो खुद बचपन से कुछ ही बड़ी हुई थी यु तो वो 21 साल की एक विवाहित युवती थी पर उसका बचपना अभी बाकि था शादी को दो साल हो गए थे। आज उसको पता चला की वो प्रेग्नेँट है तो एक अजीब सा अहसास हुआ खुश पर पता नहीं ये डर किस बात का था खैर आज भी उसको ऐसा लगता है की कल की ही बात थी बेटे के समय उसका पूरा ख्याल रखा गया था बहुत ही आराम से समय निकल गया और फिर बेटे के जन्म का समय तो मनो बड़ा ही उत्सव का माहौल था। नासमझी की कोई बात ना हो जाये इसलिए उसने अपने एकमात्र शौक का भरपूर सदुपयोग किया था। उसका एकमात्र शौक था किताबें पढ़ना और उसने बड़ी ही उम्दा किताबेँ पढ़ कर सब जानकारी पाली थी की न्यू बोर्न बेबी की परवरिश किस तरह की जाती है। और हर बात का ख्याल भी रखा उसने सिवाय अपने। फिर 5 साल का होते होते तो उसक बेटा सबकी आँखों का तारा बन गया जब बेटे की तारीफ़ होती तो वो गर्व से भर जाती है आज भी। क्या दिन और क्या रात हर समय बस बेटे की ही तीमारदारी उसकिहि जरूरतों का ध्यान और पति के काम के आलावा कुछ भी नहीं किया हाँ एक चीज जो नहीं छूटी वो थी उसकी पढ़ने की आदत कितनी भी थकान हो जाये पर कुछ पढ़ने को मिल जाए तो सारी थकान छूमंतर जाती थी. बेटे को पढ़ाते समय कुछ न कुछ पढ़ते रहना उसका बड़ा ही मनपसंद काम यु वो बढ़ी खुश रहती थी कुछ कमी अपने में लगती थी उसको। क्या पता नहीं जब अपने दोनों बच्चों की पढाई देखती तो संतुष्ट रहती और हमेशा की इनमे तो बड़ा होकर पड़ने का शौक हो ही जायेगा यु कोर्स का दोनों ही मन लगा कर पढ़ते हैं। पर उसको तो घर में वो ढेर सारी किताबों से भरा हुआ चाहती थी हर विषय की किताबें चाहे वो किसी महापुरुष की जीवनी हो या ,किसी विषय विज्ञानं की किताब और जब कुछ समय पहले उसके जन्मदिन पर बेटे ने उसकी पसंद की किताब "योगी कथामृत "ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ ए योगी " ला कर दी तो वो तो निहाल ही हो गई अपने सपूत पर। उसने भी आदत के मुताबिक बड़ी ही जल्दी उस किताब को पूरा कर लिया और कुछ सोच कर उसको दुबारा पढ़ना शुरू कर दिया।
.... ........ अवचेतन मे तो किताब के कुछ अंश हमेशा ही चलायमान रहते और जीवन के दिन अपनी गति से चल रहे है वो भी मन और अवचेतन मन मेंअपने बेटे की अच्छाइयों को बढ़ावा देते हुए अब अपने जीवन से संतुष्ट रहे का प्रयास करके खुश थी हाँ अब उसे इस बात कीकोई परवाह नहीं थी की उसके बच्चों के बड़े होने से उसकी अहमियत काम हो जाएगी क्यूंकि वक्त के साथ प्राथमिकताय बदल जाती है।
ये बात उसको समझ में आ गई थी। और वो सब काम से फुर्सत हो कर फिर अपना मनपसंद काम करने बैठ गई थी। ........
.... ........ अवचेतन मे तो किताब के कुछ अंश हमेशा ही चलायमान रहते और जीवन के दिन अपनी गति से चल रहे है वो भी मन और अवचेतन मन मेंअपने बेटे की अच्छाइयों को बढ़ावा देते हुए अब अपने जीवन से संतुष्ट रहे का प्रयास करके खुश थी हाँ अब उसे इस बात कीकोई परवाह नहीं थी की उसके बच्चों के बड़े होने से उसकी अहमियत काम हो जाएगी क्यूंकि वक्त के साथ प्राथमिकताय बदल जाती है।
ये बात उसको समझ में आ गई थी। और वो सब काम से फुर्सत हो कर फिर अपना मनपसंद काम करने बैठ गई थी। ........

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें