बुधवार, 20 जनवरी 2021

वक़्त ने किया.....

 जब 2020 कि होली आई थी तो चिंता चीन की थी दुआ उन भारतीयों के लिए थी जो वहाँ थे ,पर देखते ही देखते भारत तो क्या पूरे विश्व को दहला देने वाले वायरस की दहशत घर के आँगन तक आ गई।अब मन बेचैन हो गया।कब कहाँ से किसके ऊपर आ जाए मुसीबत ये डर दिल मे गहरे तक बैठा था।अपनों को भी देखा मुसीबत में।कुछ बीमारी में भी मनोबल बढ़ाने में लगे थे तो कुछ आर्थिक स्थिति में कमजोर हो कर टूट गए थे।पर फिर हर रात की सुबह होगी ये उम्मीद हर किसी की आँखों में दिख रही थी और है।

इतने दिनों बाद आज अपना ब्लॉग खोला है तो फिर से लिखने का जज़्बा जागा कैसे लिखी हुई कई बातें या बोली हुई बातें सच हो जाती हैं देखा 2020 में ।बच्चे कहते थे पापा के पास टाइम नहीं है, पत्नियां कहती मैं हमेशा ही घर में रहती हूँ सब बाहर निकल जाते हैं।पुरूष कहते कभी तो माइक इस 9टू5 की जॉब में ढील।और बुजुर्ग सोचते कि काश सब घर मे रुकते तो कितना अच्छा होता।और एक झटके में सब की बातें सच हो गईं।लेकिन किस कीमत पर ये जब सोचते हैं तो दर्द की एक सिरहन पूरे शरीर में उठ जाती है।जब लोकडाउन लगा तो हर व्यक्ति पिकनिक के मूड में था 21 दिन मज़े से बीतेंगे पर 10 दिन होते होते समझ में आने लगा समस्या गंभीर है।औऱ  हर देश की सरकारें परेशान।क्या होगा ये सिर्फ वक़्त को पता था। दिल औऱ आँखे कई बार रोई,जब न्यूज़ में दिखे मासूम बच्चे पैदल चलते हुए। गर्भवती महिलाओं को परेशान होते हुए ।कुछ जो निकले तो थे घर के लिए लेकिन पहुँच नही पाए सदा के लिए अपनो को छोड़ गए बिलखते हुए। पर इन सबमें भी दिखी मानवता भी जब अनजाने हाथ उठे मदद के लिए सरकारों ने लिए कुछ कड़े फैसले पर सबके हित के लिए। पर प्रकृति को भी हुआ कुछ फायदा। उसको भी साँस लेने का वक़्त मिला। सब वक़्त पर विश्वास करने लगे कि आगे सब ठीक होगा।अब शायद सब ठीक हो इसी उम्मीद के साथ 2021 मे प्रवेश कर रही है सारी दुनिया ।मन के कोने में आस जागी है सब पहले जैसा हो जाए इसी कामना के साथ ।

मंगलवार, 11 सितंबर 2018

"मन का जन्म मनुष्य के जन्म के साथ होता है या उसके भी पहले इतना तो पता नहीं पर आध्यात्मिक दृष्टि से देखो तो गीता में कहा गया है कि मनुष्य अपने मन और पाँचों इंद्रियों के स्वभाव के साथ नए जन्म या नए शरीर में प्रवेश करता है। मन को साधना बड़ा दुष्कर है। और फिर आज के परिवेश में तो कुछ कहना सूर्य को दिया दिखने के समान है ,हम यहाँ फिलॉसफी की या आध्यात्मिकता की  बातें नहीं कर रहे है ,वरन  आज के समय की ,परिस्थितियों की और मन की  समझ की बाते कर रहे है। मन के अपने दायरे है और फिर देश -काल का ,जन्म के समय की परिस्थितियों के साथ ही पारिवारिक माहौल का मन पर जन्म के साथ ही असर होने लगता है। मन की विशेषता है वह अपने को हर स्थिति के अनुरूप ढाल लेता है ,मन या कहे कि जब भी व्यक्ति अपने अवचेतन मन की बातें को अपने जीवन में मिलाने की असफल कोशिश करता है तो वह खुद तो परेशान होता ही है साथ ही अपने सामाजिक और पारिवारिक जीवन में भी परेशानी पैदा कर लेता है। मन के विचारों को रोक नहीं सकता ,जब व्यक्ति दुखी हो या जब वह सुखी हो ये तो उसकी आम जिंदगी की स्थिति है उसी समय उसके अवचेतन मन में कुछ अलग ही विचार उबाल लेते है क्या पता वो भविष्य की किसी योजना में खोया है या अतीत के किसी खुशी के पल में अटका हुआ बैठा हो , मन को वश में करना कोई खेल नहीं लेकिन यदि किसी एक तरीके की बात की जाये तो योग -विज्ञानं से अच्छा कुछ हो नहीं सकता। 
           "योग के विषय में अभी तक सीमित जानकारी थी तो लगता था ये कैसे इतना प्रभावपूर्ण हो सकता है किसी भी स्थिति में पर जब योग को गहराई से समझा तो पता चला ये समुंद्र है ज्ञान और विज्ञानं की जानकारी का।  योग को सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य की लिए ही नहीं वरन मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत महत्व पूर्ण माना गया। आयुर्वेद में भी कहा गया है  75 % बीमारियां पेट की वजह  है वही बाकि 25 %बिमारियों की जड़ मस्तिष्क की अवस्था पर निर्भर करती है। योग की जब बात होती है तो लोग या तो अपने अधूरे ज्ञान की वजह से ये नहीं पाते की वास्तव योग जीवन जीने की कला का नाम है आज की बिना नियम की दिनचर्या में तो योग का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है। और हमारा ये दायित्व है की यदि हमें इसका सही प्रकार से कुछ भी ज्ञान है तो उसको अपने साथ ही लोगो के लिए उसका लाभ मिले ऐसा कदम उठाना चाहिए। यदि हिंदी में योग का अर्थ देखा जाये तो वह है "जोड़ना "जोड़ना पर कहा किसे यही समझना योग -विज्ञानं है। जब हम कही भी योग जिसको आजकल की मॉडर्न भाषा में योगा कहने लगे है की बात चलती है तो लोगों को जो पता है वो है योग का एक अंग जिसे आसन कहते है योग की सम्पूर्ण जानकारी के अनुसार योग के आठ अंग है जिनसे योग पूर्ण होता है। परन्तु ऐसा नहीं की जब कोई योग के आठो अंग अपनाये तभी वह सही योग करेगा योग के आठों अंग अपने में पूर्ण है। ये अंग है "यम ,नियम ,आसन ,प्राणायाम ,प्रत्याहार ,ध्यान ,धारणा ,और समाधि। "
              जब हम योग को अपनाते है तो सबसे पहले हमारा मन एकाग्र या कहे सकारात्मक होता है ,फिर कुछ समय के अभ्यास के बाद शरीर में सकारात्मक  ऊर्जा का संचार होने लगता है।  दिनचर्या में ये फर्क साफ दिखाई  देने लगता है ,उसके बाद हमारा अवचेतन मन धीरे -धीरे हमारे वश में होता जब वह हमारे वश हो तो फिर वह जो अनजाने में ही हमें सकारात्मक से दूर करता है उसमे रोक लगती है ,व्यक्ति खुद अपने विचारों का द्रष्टा बन कर उन विचारों को सही मार्ग में ले आने में सक्षम हो जाता है ,योग के लिए सबसे पहले आसन नहीं बताए गए ,पहले नियम और यम बताये गए है।  परन्तु यदि पहले आसन करना आसान लग रहा तो कर सकते है। एक  समय में योग सन्यसियों या मोक्षमार्ग के साधकों के लिए है ,ऐसी भ्राँति  फैला दी गई थी ,योग साधना को दुर्लभ और कठिन मन जाता था, फलस्वरूप ये विद्या लुप्त होती जा रही थी 19 वी सदी के प्रारंभ से अभी तक अनेको संतों और धर्मगुरुओं ने ये जिम्मा उठा कर योग को जन जन के लिए सुलभ और लाभदायक है ये प्रचारित करने के साथ साधारण गृहस्थ को शिक्षित भी किया। योग से मानसिक बीमारियां जड़ से दूर हो जाती है बशर्ते रोगी कुछ नियमो का पालन  करने के साथ ही सही खानपान और कुछ विशेष आसन समय पर करे।  योग करने के साथ _साथ अपने मन में यह बात  

              

गुरुवार, 11 मई 2017

BHAVNAO SE BHAGYA BADAL JATE HAi

"भावनाओं से भाग्य बदल जाते है ,ये वाक्य बहुत जगह पढ़ा पर जब खुद आजमाया तब ऐसा लगा कि सचमुच ये  बात जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है  जब   जीवन में   अप्रिय    नकारात्मक घटना घट जाती है तो हमारा     जीवन निराशा से भर उठता है हम दुःख की भावना को स्थाई जगह  अपने जीवन में दे देते है ,और हर परिस्थिति एवम घटना को उसी से जोड़ कर नकारात्मक विचारो और भावनाओं को ही   सच  मन  लेते है पर  जब कुछ अच्छा भी होता है तो उसको थोड़ी  देर की  ख़ुशी   मान कर फिर निराशा की चादर ओढ़ लेते है। '
                 जीवन में जो होता है वह भले ही पहले से निश्चित हो अच्छा या बुरा पर मयने तो इस बात के है कि   आप उस पर प्रतिक्रिया कैसी  है " आज जीवन में सबसे ज्यादा इसी बात की  जरुरत है कि  हम अपनी भावनाओं को समझे और जीवन में  सही तरीके से उनका उपयोग करे तो बहुत सी समस्याएं तो यु ही सुलझ जाएँगी जैसे कि कभी आप सुबह लेट उठे और फिर आपके मन में विचार आया कि अरे अब सब गड़बड़ होगी और एक के बाद एक गड़बड़ होती जाती है और आप सोचते हो मैंने तो कहा   था कि ऐसा ही होगा। सच में आप
 सही है आप जो कहते है वही होता है आपकी भावना बहुत प्रबल होती है उसको आप को नियंत्रित करना होगा। आप के साथ रोज़ के जीवन में ही धीरे धीरे आप को अपनी भावना पर काबू पाना होगा एक बार जब आप अपनीभावना को समझ ने लगेंगे तो आप अहसास  की  भावनाओ के बदलने   से  बहुत सी परेशानिया तो जीवन में है ही नहीं  उनको हमने खुद ही नकारात्मकता की वजह से अपने जीवन में स्थान दे दिया है. जैसे कोई अगर हमसे या हमारी अच्छी बात करता है तो वो हम दो-चार दिनों में भूल जाते है लेकिन यदि कोई हमसे कड़वा बोलता है या कोई हमारी बुराई बताता है तो हम उसे दो-चार साल तक या जब तक पलट कर जबाब न देदे तब याद रखते है यही गलत है क्योकि इस वजह से हम अपने जीवन के अनमोल पलों को यु ही जाया कर देते है ये सोचने में कि उसने मेरे बारे में ये क्यों कहा और भी कई बाही तों पर उस बात का नकारात्मक असर होता है। इसलिए हमे अपनी भावनाओँ को सकारात्मकता की दिशा में मोड़ कर जीवन को आसान बनब चाहिए। 
         "जीवन बहुत ही आसान है जब तक कि उसमे नकारात्मक विचार और भावनाओ का दखल ज्यादा नहीं है और जैसे ही हम अपने जीवन में इन बेकार की बातों को ज्यादा तबज़्ज़ो देने लगते है हम अपने ही आसपास एक दीवार बना लेते है जिसका असर हमारे जीवन के हर क्षेत्र  चाहे वह आर्थिक हो या पारिवारिक और चाहे सामाजिक हो या आध्यात्मिक हर क्षेत्र में हम अपने को कमजोर पाते है यही तो भावनाओ का खेल है। ....... ....... इसलिए विलियमजेनिंग्स ब्रायन  का ये कथन है कि 'भाग्य संयोग से  नहीं बनता। यह तो आपके विचारों के चयन से  बनता है "{विलियम जेनिंग्स ब्रायन }{अमेरिकी नेता ]जीवन पर  शतप्रतिशत लागू होता है। 

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

AHMIYAT

बड़े होते बच्चों की माँ की अहमियत क्या सचमुच  हो जाती है, या ये सिर्फ भ्रम है एक माँ का।  आज   फिर वो बेटे से कहती रह गई की कुछ खा लो और वो मशीन की तरह घर बाहर निकल गया। वो काम कर रही थी पर उसका मन तो 15 साल पहले की यादों में खो गया जब वो खुद बचपन से कुछ ही बड़ी हुई थी यु तो वो 21 साल की एक विवाहित युवती थी पर उसका बचपना अभी बाकि था शादी को दो साल हो गए थे। आज उसको पता चला की वो प्रेग्नेँट है तो एक  अजीब सा अहसास हुआ खुश  पर पता नहीं ये डर किस बात का था खैर  आज भी उसको ऐसा लगता है की कल की ही बात थी बेटे के समय उसका पूरा ख्याल रखा गया था बहुत ही आराम से समय निकल गया और फिर बेटे के जन्म का समय तो मनो बड़ा ही उत्सव का माहौल था। नासमझी की कोई बात ना हो जाये इसलिए उसने अपने एकमात्र शौक का भरपूर सदुपयोग किया था। उसका एकमात्र शौक था किताबें   पढ़ना और उसने बड़ी ही उम्दा किताबेँ पढ़ कर सब जानकारी पाली थी की न्यू बोर्न बेबी की परवरिश किस तरह की जाती है। और हर बात का ख्याल भी रखा उसने सिवाय अपने। फिर 5 साल का होते होते तो उसक बेटा सबकी आँखों का तारा बन गया जब बेटे की तारीफ़ होती तो वो गर्व से भर जाती है  आज भी। क्या दिन और क्या रात हर समय बस बेटे की ही तीमारदारी उसकिहि  जरूरतों का ध्यान और पति के काम के आलावा कुछ भी नहीं किया हाँ एक चीज जो नहीं छूटी वो थी उसकी पढ़ने की आदत कितनी भी थकान हो जाये पर कुछ पढ़ने को मिल जाए तो सारी थकान छूमंतर जाती थी.  बेटे को पढ़ाते समय  कुछ न कुछ पढ़ते रहना उसका बड़ा ही मनपसंद काम यु वो बढ़ी खुश रहती थी  कुछ कमी अपने   में लगती थी उसको। क्या पता नहीं जब अपने दोनों बच्चों की पढाई देखती तो संतुष्ट रहती और हमेशा की  इनमे  तो बड़ा होकर पड़ने का शौक हो ही जायेगा यु कोर्स का दोनों ही मन लगा कर पढ़ते हैं। पर उसको तो घर में वो ढेर सारी किताबों से भरा हुआ चाहती थी हर विषय की किताबें चाहे वो किसी महापुरुष की जीवनी हो या ,किसी विषय विज्ञानं की किताब और जब कुछ समय पहले उसके जन्मदिन पर बेटे ने उसकी पसंद की किताब "योगी कथामृत "ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ ए  योगी " ला कर दी तो वो तो निहाल ही हो गई अपने सपूत पर। उसने भी आदत के मुताबिक बड़ी ही जल्दी उस किताब को पूरा कर लिया और कुछ सोच कर उसको दुबारा पढ़ना शुरू कर दिया।
 .... ........ अवचेतन मे तो  किताब के कुछ अंश हमेशा ही चलायमान रहते और जीवन के दिन अपनी गति से चल रहे है  वो भी मन और अवचेतन मन मेंअपने  बेटे की अच्छाइयों को बढ़ावा देते हुए अब अपने जीवन से संतुष्ट रहे का प्रयास करके खुश थी हाँ अब उसे इस बात कीकोई  परवाह नहीं थी की उसके बच्चों के बड़े होने से उसकी अहमियत काम हो जाएगी क्यूंकि वक्त के साथ प्राथमिकताय बदल जाती है।
       ये बात उसको समझ में आ गई थी। और वो सब काम से फुर्सत हो कर फिर अपना मनपसंद काम करने बैठ गई थी। ........ 

avchetan ki avdharna: avchetan ki avdharna: Samsya ki pahchan

avchetan ki avdharna: avchetan ki avdharna: Samsya ki pahchan: avchetan ki avdharna: Samsya ki pahchan : " अरे ये तो रोज़ होता है "हाँ यही तो वो शब्द है जो रोज़ ही वो बोला करते है.वो से मतलब बच्च...

रविवार, 16 अप्रैल 2017

DO MAN

"सुबह उठते ही हाथ मशीन की तरह और दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है ,फिर भी समय की कमी हमेशा बनी रहती है क्या कुछ नहीं करती वो समय से जीतने की। हर रोज़ पर समय है कि उसको हमेशा मात दे वो देता है ,और वो चुपचाप फिर नई कोशिश करने में जुट जाती है। आज भी यही हो रहा था सुबह से और उसका मन तो कहीं और ही छलांगे लगा रहा था ,एक मन में रोज़ की रूटीन का मेनू चल रहा है और एक मन में तो जाने क्या चल रहा था ,खुश तो आज वो बहुत है पर क्यों ये तो उसका मन जाने या कहें अवचेतन में आज की तारीख को फिर याद करके जाने कितने नए विचार आ गए। आज से शायद  20 साल या कहें जब से उसे याद है उसने पहली बार अपने पिता को सत्यनारायण की कथा सुनाई थी और उन्होंने उसे 11 रूपये देकर कहा था खूब विद्या आये तुम्हारे पास और  बस उसने किताबों से बड़ी गहरी दोस्ती कर ली थी।   पिता के घर किताबों की कोई कमी नहीं थी। और उसको पढ़ने का शौक इस कदर था की , खाना -पीना ही भूल जाय , ज्योतिष,पुराण ,कीरो, ओशो  मासिक पत्रिकायें हो या अपने कक्षा की किताबें सब को घोल कर पिने का जूनून था कभी सोचा नहीं की इनके बहार भी दुनिया है। जब हस्तरेखा ज्योतिष पढ़ी तो मन पढाई से हट गया ,पर  कहीं और तो मन लगता ही नहीं फिर क्या  करें तब पिता ने उदासी का कारण जान कर पास बिठाया और पूछा क्या हुआ तो उसने रोते हुए बताया की उसके हाथ में विद्या की रेखा नहीं है।  ज्योतिष पिता ने हाथ पकड़ कर एक रेखा खींच दी और बोले ये रही विद्यारेखा, रेखाओं से कुछ नहीं होता कर्म से भाग्य को बदला जा सकता है  पाने घर में इतनी किताबें है की तुम पढ़ते पढ़ते थक  जाओ पर वो ख़त्म नहीं होंगी इनको पढ़ो। रही बात डिग्रीयो की तो डिग्रीयां ज्ञान नहीं देती ,ज्ञान किताबों में है और पढ़ करा उसे प्राप्त कारण आदमी के बस में।  10 साल की लड़की के कितने समझ में आया पता नहीं पर ये बातें उसके अवचेतन मन में हमेशा के लिए बैठ गई और  वो किताबों की हमेशा -हमेशा की दोस्त हो गई ,आज जब चैत्र पूर्णिमा आई तो25 साल पहली की घटना यु मन के किसी कोने से सामने आ कर कड़ी हो गई  जैसे कल की बात हो औरउसका मन इतना खुश है की पिता की गैरमौजूदगी का अहसास भी इस ख़ुशी  को काम नहीं कर पाई क्योकि इन्ही किताबों कारण ही तो पिता उसके अवचेतन में अभी भी बसें हुए  है और उसका    एक मन  बेटी बन कर हमेशा अपने पिता की इस सीख को सबके साथ बाटता रहता है। .........
       ....... ारे अरे ये क्या सब्जी जल जाएगी उसके एक मन ने उसे वापस रोज़ की दुनिया में खींच लाया और एक मन फिर खुश हो कर सोचने लगा की आज अधूरी किताब पूरी कारण है सब काम के बाद और उसके हाथ जल्दी -जल्दी काम निपटाने लगे। ........ ....... उसकी दोनों मन साथ साथ खुशी से मुस्काने लगे। ......... 

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

MAN KI BATIEN ,MAN HI JAANE.

"मन के कितने रूप है ये कोई कैसे जान सकता है ,जब भी समझने की कोशिश करो कुछ अलग ही समझ मिली मेरे मन की जाने कौन से लेकर मन की गति मन ही जाने तक की बातें बस मन ही करता है."                                    मन से आज फिर एक औरत का मन माँ के मन से फिर बहस हुई और माँ का मन जीत गया  ओरत फिर एक कोने में खड़ी देखती रह गई।........ मन के किसी कोने में फिर एक याद ने करवट ली और ओरत का मन फिर बेटी के मन से उलझ गया और फिर एक बेटी के मन की जीत हो गई ,बेटी इठलाती हुई आगे बढ़ गई और औरत का मन चुप -चाप देखता रहा।  ........ मन का आज फिर मन से समझौता हुआ आज फिर पत्नी ने औरत के मन को समझ दिया औरत का मन फिर किसी कोने में नहीं था बस मन के हर कोने में एक और मन था।
एक बेटी का मन ,एक माँ का मन ,एक पत्नी का मन। हाँ मन के हर मन में औरत ने अपने मन को मिला दिया और सब को मिला कर एक प्यारा सा मन बन गया जिसे दुनिया में कोई आज तक समझ नहीं सका जितना औरत के मन को समझने की कोशिश हुई उतने ही अविष्कार हो गए। कभी किसी ने औरत के मन को मोम कहा तो कभी बहता दरिया ,पर औरत का मन  हर कोई कैसे समझे  महादेवी वर्मा की लछमा का मन कोण समझ सकता है जब की आज भी हर औरत में वो थोड़ी सी बाकि है , प्रेमचंद की सुभागी भी तो हर बेटी के मन में बसी है चाहे एक गरीब की बेटी हो या आमिर की हर बेटी का सपना सुभागी की तरह ही है में ऐसा कुछ कर की मेरे पिता का सर गर्व से तन जाये आसमान के तारों से भी ज्यादा खुशियाँ हो मेरे पिता के आँगन में। ......
       और माँ की तो बात ही निराली है हर माँ का मन अपने  बच्चो की उन्नती को देखने की आस लगाए बैठा रहता है ,, किसी कोने में ये आस होती है जो मैंने नहीं किया वो मेरी संतान करेगी और बस यही से बस जिंदगी की शुरुआत और यही मन की आस के साथ जिंदगी को विराम पर नहीं औरत का मन कभी आस लगाना नहीं छोड़ता फिर एक नै आस एक नया विस्वास की अब सब मेरे मन के मुताबिक होगा। ..... मन फिर नई  गति से चल देता है अपना एक नया रूप लेकर कभी माँ का कभी बेटी का , या किसी और रूप में ही जिंदगी की रफ़्तार के साथ कदम मिलाने की उम्मीद के साथ। .......  मन की इस बात पर मन ने फिर मन से कहा की आज कुछ काम का मन नहीं है मन ने फिर  कहा ऐसा कैसे हो की काम न करना पड़े अब चलो अब कुछ काम करे मन। ........