"विचारों से ही हमारा व्यक्तित्व बनता है। हमारे जैसे विचार अवचेतन मन में चलते है , वही विचार हमारे आने वाले कल का निर्माण करते है। हर एक का अपना एक नज़रिया होता है ,जिस तरह वो अपने आसपास की हर घटना को अपने मन -मस्तिष्क में जिस भी तरह से ग्रहण करता है , वो अलग होता है और बाहर के लिए वह एक अलग द्रष्टिकोण रखता है।"
"अवचेतन मन में हमेशा अलग विचार चलते रहते है ,हमारा अवचेतन बहुत शक्तिशाली है वो हर परिस्थिति को अपने हिसाब से ढाल लेता है ,या यूँ कहे कि अवचेतन मन में जिस घटना को जिस रूप में अपनाया है ,उसी पर हमारा भविष्य टिका होता है , हमारे अवचेतन पर वही अंकित होता है जैसा वो महसूस करता है जब से हम सोचने लगते है ,तभी से हमारे मन -मस्तिष्क में एक प्रक्रिया के तहत धारणा बन जाती है और वो हमारे अवचेतन में हर घटना को अपने एक सकारात्मक या नकारात्मक नज़रिये का जामा पहना कर उस घटना को बहुत बड़ी या छोटी बनालेता है , हमारा जीवन इसी बात पर निर्भर करता है कि हमारे रोज़ की दिनचर्या में जो भी घटित हो रहा है उसको हमारा अवचेतन मन किस रूप में ले रहा है।
अवचेतन मन में हमेशा भूतकाल की घटनाओं का प्रभाव रहता है उसी पर आपका व्यक्तित्व बनता है जैसे किसी के बचपन में कोई अपना मृत्यु को प्राप्त हो जाये तो या वह मृत्यु से डरने लगेगा या मृत्यु को जीवन का एक हिस्सा समझ कर उसे स्वीकार कर लेगा। उसी तरह हर अच्छी या बुरी घटना को हमारा मन कैसे स्वीकार करता है ,यही नजरिया हमारे भविष्य की सफ़लता और असफ़लता में भूमिका निभाता है। "
जब हम पढ़ते है ,जब हम सोते है जब हम घूमने जाते है या हम यूँ कह सकते है कि हमारा अवचेतन मन हमसे अलग़ हमेशा अपनी दुनिया में मशगूल रहता है। ,
"अवचेतन मन में हमेशा अलग विचार चलते रहते है ,हमारा अवचेतन बहुत शक्तिशाली है वो हर परिस्थिति को अपने हिसाब से ढाल लेता है ,या यूँ कहे कि अवचेतन मन में जिस घटना को जिस रूप में अपनाया है ,उसी पर हमारा भविष्य टिका होता है , हमारे अवचेतन पर वही अंकित होता है जैसा वो महसूस करता है जब से हम सोचने लगते है ,तभी से हमारे मन -मस्तिष्क में एक प्रक्रिया के तहत धारणा बन जाती है और वो हमारे अवचेतन में हर घटना को अपने एक सकारात्मक या नकारात्मक नज़रिये का जामा पहना कर उस घटना को बहुत बड़ी या छोटी बनालेता है , हमारा जीवन इसी बात पर निर्भर करता है कि हमारे रोज़ की दिनचर्या में जो भी घटित हो रहा है उसको हमारा अवचेतन मन किस रूप में ले रहा है।
अवचेतन मन में हमेशा भूतकाल की घटनाओं का प्रभाव रहता है उसी पर आपका व्यक्तित्व बनता है जैसे किसी के बचपन में कोई अपना मृत्यु को प्राप्त हो जाये तो या वह मृत्यु से डरने लगेगा या मृत्यु को जीवन का एक हिस्सा समझ कर उसे स्वीकार कर लेगा। उसी तरह हर अच्छी या बुरी घटना को हमारा मन कैसे स्वीकार करता है ,यही नजरिया हमारे भविष्य की सफ़लता और असफ़लता में भूमिका निभाता है। "
जब हम पढ़ते है ,जब हम सोते है जब हम घूमने जाते है या हम यूँ कह सकते है कि हमारा अवचेतन मन हमसे अलग़ हमेशा अपनी दुनिया में मशगूल रहता है। ,
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