बुधवार, 15 मार्च 2017

Samsya ki pahchan


" अरे ये तो रोज़ होता है "हाँ यही तो वो शब्द है जो रोज़ ही वो बोला करते है.वो से मतलब बच्चे जो दिनभर ही यहाँ वहां  घुमा करते है। जब भी उनको बोलो की पढाई करलो या कुछ और काम तो उनको बड़ी ही ऊब आती है पर क्या बच्चो के मन में कुछ ऐसा चल रहा  होता है कि हम बड़े जब भी उनको कुछ कहने वाले होते है वो समझ जाते कि ऐसा तो रोज़ ही होता है और वो सब समझने का नाटक करते है और हम बड़े अपने बड़प्पन में उनके मन की बात समझने की कोई भी तरह से तैयार ही नहीं होते जबकि बच्चो का मन या कहे अवचेतन मन बहुत ही  सरल तरीके से कठिन  बात  या  समस्या का हल ढूंढने में सक्षम होता है। हम जब  भी हताश या निराश हो तो बच्चो की दिनचर्या कुछ ज्यादा ध्यान से देखे तो पाएंगे की उनके तो खेल में ही हमारी समस्या का निदान होता है बस थोड़ा रुक कर और
शांत मन से हम यदि जिंदगी को बच्चो के नज़रिए से देखें तो हर परेशानी का हल हमारे पास होता है, पर हम इस दौड़ धुप की वजह से ये समझ ही नहीं पाते की जिसे हम परेशानी समझ रहे है वो तो खुद में एक अवसर है,हमे और सक्षम बनाने का और हम उस परेशानी में अपने आप को तो कमजोर करते ही है साथ ही अपने आसपास के लोगो को भी परेशानी में डाल देते है ,लेकिन बच्चों की तरह सोचने से कई बार हल तो मिलता ही है,और हमारा मन भी प्रसन्न होता है जिससे हमारा जीवन सकारात्मकता पूर्ण हो जाता है और   हम  जीवन की एक सीढ़ी आगे बढ़ने में सफल होते है   तभी तो  हम कह सकते है कि" ये तो रोज़ होता है "   जब हम इस तरह जीवन की हर बात को अपने सकारात्मक द्रष्टिकोण से देखते है तब ही तो अपने बच्चों को भी वही नज़रिया दे पाते  है और वे अपने भविष्य में सकारात्मक द्रष्टिकोण को अपना कर एक सफल व्यक्ति के रूप में अपनी पहचान बनाते है।   .... .... ....... 

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