गुरुवार, 23 मार्च 2017

har yug me stree shiksha ka roop

" कुछ अलग विषय पर विचार आए तो कुछ अटपटा , अनमना सा मन किसी और ही दौर में पहुँच गया तो फिर उन विचारो को शब्दों में ढाला तो प्रश्न ही प्रश्न मन में घुमड़ने लगे और उत्तर भी खुद ही सूझने लगे पर क्या ये उत्तर सही होंगे। .........
         बहुत पीछे न जा कर एक युग पीछे मन चल पड़ा राम- कृष्ण के युग में मन में प्रश्न आया कि आम लोग कैसे अचार -व्यवहार करते होंगे कैसे नियम होंगे क्या नारी को शिक्षा का अधिकार होता होगा या आजादी से घूमने फिरने का मौका मिलता होगा। ...... हाँ क्यों जब रामायण -महाभारत पड़ते है तो ये कही स्पष्ट तौर पर तो नहीं लिखा पर घटनाओं को थोडे ध्यान देकर समझा जाये तो उन कालो में ही  नहीं वरन कलियुग में और हर शासन काल में स्त्री की शिक्षा घर के भीतर ही बहुत सुनियोजित तरीके से होती रही है। .... चाहे हम सीता की नहीं उनकी सखियों और दासियो की किसी बात विशेष पर ध्यान दे तो पाते है कि वो लोग निर्णय लेने में परिस्थितियों के अनुरूप सछम तो थी ही अपितु वे सही सलाह भी देती थी फिर चाहे तो कोई मने या मने ,कुछ उदाहरण बहुत मायने रखते है पुराणों में। . ..... द्धापर में स्त्री  शिक्षा देखने को मिलती है सभी स्त्री पात्रों को स्वनिर्णय लेते हुए पढ़ा जा सकता है चाहे वह गांधारी हो, कुंती हो,माद्री हो ,सुभद्रा हो,या द्रोपदी या रुक्मणी या राधा जिनको भी सिर्फ उनका चरित्र चित्रण पढ़े तो पाते है की ये सभी नारिया उच्च श्रेणी की बुद्धिजीवी थी और जब सबसे प्रचलित नायक कृष्ण की जीवनी में गोपियों को जानने की कोशिश करे तो उन्होंने तो उद्धव को भी प्रेम -भक्ति की और मोड़ देने में सफलता पाई थी यशोदा -देवकी ,रोहणी ,हो या कोई और पात्र सभी ज्ञान या कहे की बुद्धिमानी का परिचय देती जान पड़ती है। क्या उस युग में स्त्रियों को आज़ादी भी थी तो हाँ जब सुभद्रा ने अर्जुन को चुना या रुक्मणी ने कृष्ण को। यही नहीं पुराणों में और भी न जाने कितने स्त्री पात्र ऐसे है जिनको कुछ पन्नो में ही पढ़ कर भूल गए है पर उनके निर्णय ने युग निर्माण में और सही गलत के फैसलों में बहुत ही निर्णायक  भूमिका निभाई है ,जब भी किसी भी युग मै कुछ अति गंभीर या निर्णायक होता है तब स्त्री ही वो शक्ति है जो सब समेट की क्षमता रखती है। जिस भी  युग में देखे स्त्री को हर जगह सक्षम है। वो  किसी युग में बंधी हुई तो नहीं थी इस दृष्टि से देखें तो जब रावण ने सीता को अशोक वाटिका में रखा तो ये रावण का निर्णय था  साथ ये सीता की खुद का निर्णय भी था ये सीता के  व्यक्तित्व की दृढ़ता भी दर्शाती है। आगे की बातें अगले लेख है। ........

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